भाजपा से गठबंधन कर ईपीएस को भले ही 4 साल सरकार चलाने में मदद मिली, लेकिन चुनाव में यह नुकसानदेह साबित हुआ। अल्पसंख्यक मुस्लिम और ईसाई मतदाताओं ने उससे दूरी बना ली। विपक्षी दलों ने ईपीएस को भाजपा की रिमोट कंट्रोल सरकार साबित कर भाजपा के प्रति नाराजगी को जमकर भुनाया। कमल हसन टीटीवी दिनाकरण और अभिनेता विजयकांत की पार्टी भले ही 1 सीट भी न जीत पाई हो, लेकिन कई सीटों पर यह अन्नाद्रमुक को नुकसान पहुंचाने में जरूर सफल रही।
शशिकला को पार्टी से निकालने के चलते जहां दबंग थेवर और नाडार पार्टी से दूर हुए वहीं, 14 तटवर्ती जिलों में डीएमके अल्पसंख्यक ईसाई मछुआरों को साधने में ज्यादा सफल रही। डीएमके ने अडाणी पोर्ट, वेदांता समूह तथा केंद्र सरकार के बंदरगाह प्रोजेक्ट के विरोध को भी जमकर भुनाया। भाजपा ने उत्तर प्रदेश और बिहार की तर्ज पर तमिलनाडु में जातिगत मुद्दों को हवा देकर एक नए जातीय समीकरण का गांव खेला, लेकिन वनियार, गाउंडर और देवेंद्रकुला वेल्लालार को साथ लाने से पश्चिम तमिलनाडु में तो फायदा हुआ, लेकिन बाकी जगहों पर यह प्रयोग नुकसानदेह साबित हुआ।
डीएमके की जीत में एक बड़ा योगदान उनके घोषणापत्र का भी रहा। पेट्रोल-डीजल में 5 रुपए और गैस सिलेंडर में 100 रुपए की छूट का वादा गेम चेंजर रहा। मुफ्त गिफ्ट के वादों की भरमार तो अन्नाद्रमुक के घोषणा पत्र में भी थी, लेकिन डीएमके, कई वादों को अपने दबाव में लिया फैसला साबित करने में सफल रही। केंद्रीय नेताओं के हिंदी में भाषण ने भी तमिल मतदाताओं को एनडीए गठबंधन से दूर किया।
उत्तरी तमिलनाडु
चेन्नई जैसी कि उम्मीद थी डीएमके ने सभी 16 सीटें जीत ली। वेल्लूर से 1971 से विधायक बनते आ रहे दुरई मुरूगन फिर जीत गए, लेकिन कांचीपुरम विल्लुपुरम में शाह-मोदी की सभा बेअसर रही। अभिनेत्री खुशबू सहित भाजपा के तीनों प्रत्याशी हार गए। कांग्रेस ने चेन्नई में खाता खोला। अडाणी पोर्ट प्रोजेक्ट के बहाने अन्नाद्रमुक को केंद्र की कठपुतली साबित करने में सफल रही। युवाओं के लिए घोषणा और नीट का विरोध डीएमके के लिए फायदेमंद रहा। जयललिता की संदिग्ध मौत को भी जमकर मुद्दा बनाने की रणनीति फायदेमंद रही। एंटी इनकंबेंसी का भी नुकसान उत्तरी तमिलनाडु में ज्यादा हुआ।
मध्य तमिलनाडु( कावेरी डेल्टा)
2016 में एआईएडीएमके 47 में से 29 सीट जीती थी। डीएमके को इस बार हाइड्रोकार्बन प्रोजेक्ट और कर्नाटक के प्रस्तावित बांध का विरोध और कम्युनिस्ट के साथ का फायदा मिला। विपक्षी दल, अन्नाद्रमुक को केंद्र की कठपुतली सिद्ध करने में काफी हद तक सफल रहे। ईपीएस सरकार ने किसानों की नाराजगी दूर करने के लिए कावेरी डेल्टा को एग्रीकल्चर प्रोडक्टेड जोन घोषित किया, लेकिन पुराने हाइड्रोकार्बन प्रोजेक्ट बंद न कर पाना नाराजगी का सबब बना। धान उत्पादक क्षेत्र में किसानों में एग्रीकल्चर बिल को लेकर भी नाराजगी थी। डीएमके को अपने घोषणा पत्र और करुणानिधि का गृह क्षेत्र होने से भी, अपने पुराने गढ़ की वापसी में मदद मिली।
पश्चिम तमिलनाडु
मुख्यमंत्री ईपीएस का गृह क्षेत्र पहले भी अन्नाद्रमुक का परंपरागत गढ़ रहा है। 2016 में भी 57 में से 47 सीट जीती थी। इस बार 74 में से भी 80% सीट यहीं से जीती हैं। सजातीय गाउंदर जाति के भरपूर समर्थन के साथ सीएम को वनियार जाति को आरक्षण देने का फायदा भी मिला। सेलम 8 लेन हाईवे प्रोजेक्ट के विरोध ने कुछ सीटें जरूर कम की। भाजपा ने भी यहां 2 सीटों पर खाता खोला।
दक्षिणी तमिलनाडु
कभी एमजीआर फिर जयललिता दक्षिण से जीतकर ही सीएम बने। भाजपा को पहला सांसद भी यही के कन्याकुमारी से मिला। मोदी-अमित शाह की क्षेत्र में 6 सभाएं, रोड शो हुए, लेकिन ईसाई बहुल तटवर्ती जिलों में डीएमके मछुआरों को अपने जाल में फंसाने में ज्यादा सफल रही। दिनाकरन को सबसे ज्यादा उम्मीद यहीं से थी, जो नाकाम साबित हुई। शशिकला को निकालने और वनियार को आरक्षण से नाराज थेवर, नाडार जाति की नाराजगी, मछुआरों पर श्रीलंकाई सेना के बढ़ते हमले, इनायम बंदरगाह प्रोजेक्ट का विरोध प्रमुख चुनावी मुद्दे रहे।
चार पार्टियों का सफाया
इस बार के चुनाव में बड़ी खिलाड़ी मानी जा रही तमिलनाडु की चार क्षेत्रीय पार्टियों का पूरी तरह सफाया हो गया। इसमें से कभी नेता प्रतिपक्ष रहे अभिनेता विजयकांत की पार्टी 'डीएमडीके' भी शामिल है। कभी 29 विधायक होते थे। अभिनेता कमल हासन कोयंबटूर से खुद की सीट भी नहीं बचा सके। 29 सीट के उपचुनाव में अच्छा प्रदर्शन कर चुकी शशि कला के भतीजे टीटीवी दिनाकरण की पार्टी 'एएमएमके' एक भी सीट नहीं जीती। ऐसा ही एक और नाम प्रभाकरण को आदर्श मान चुनाव लड़ने वाली कट्टर तमिल राष्ट्रवादी पार्टी 'नाम तमिलर कच्छी' (एनटीके) का है। 6% वोट हासिल कर चुकी युवा नेता सीमान की पार्टी ने इस बार भी उपस्थिति तो दर्ज कराई, लेकिन सीट एक भी नहीं मिली।
पुडुचेरी, अबकी बार एनडीए सरकार, रंगास्वामी का सीएम बनना तय
30 विधानसभा सीटों वाली पुडुचेरी में एन रंगासामी के नेतृत्व में एनडीए सरकार बनना लगभग तय है। भाजपा ने कांग्रेस से अलग हुई एनआर कांग्रेस के साथ चुनाव लड़ा था। एनआर कांग्रेस ने अपने हिस्से की 16 में से 10 सीटें जीती तो भाजपा 9 में से 6 पर विजयी रही। डीएमके-कांग्रेस गठबंधन 8 सीटों पर सिमट कर रह गया। निर्दलीय एवं अन्य पार्टियों के 6 प्रत्याशी सरकार बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका में आ गए हैं।
पुडुचेरी में तीन केंद्र द्वारा नामांकित विधायक भी होते हैं। इसलिए एनडीए को सरकार बनाने में कोई दिक्कत नहीं होगी। गौरतलब है कि आधा दर्जन विधायकों के दल बदल के चलते वी नारायणसामी की कांग्रेस सरकार समय से पहले गिर गई थी। एंटी इनकंबेंसी के चलते कांग्रेस अपने हिस्से की 14 में से सिर्फ 2 सीटें ही जीत पाई। मोदी शाह के दौरे का असर यहां दिखा, लेकिन राहुल गांधी का दौरा नाकाम रहा।

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